22
इलिफ़ज़ को तिसरा जवाब
तब इलिफ़ज़ तेमानी ने जवाब दिया,
क्या कोई इंसान ख़ुदा के काम आ सकता है?
यक़ीनन 'अक़्लमन्द अपने ही काम का है।
क्या तेरे सादिक़ होने से क़ादिर — ए — मुतलक को कोई ख़ुशी है?
या इस बात से कि तू अपनी राहों को कामिल करता है उसे कुछ फ़ायदा है?
क्या इसलिए कि तुझे उसका ख़ौफ़ है,
वह तुझे झिड़कता और तुझे 'अदालत में लाता है?
क्या तेरी शरारत बड़ी नहीं?
क्या तेरी बदकारियों की कोई हद है?
क्यूँकि तू ने अपने भाई की चीज़ें बे वजह गिरवी रख्खी,
नंगों का लिबास उतार लिया।
तूने थके माँदों को पानी न पिलाया,
और भूखों से रोटी को रोक रखा।
लेकिन ज़बरदस्त आदमी ज़मीन का मालिक बना,
और 'इज़्ज़तदार आदमी उसमें बसा।
तू ने बेवाओं को ख़ाली चलता किया,
और यतीमों के बाज़ू तोड़े गए।
10 इसलिए फंदे तेरी चारों तरफ़ हैं,
और नागहानी ख़ौफ़ तुझे सताता है।
11 या ऐसी तारीकी कि तू देख नहीं सकता,
और पानी की बाढ़ तुझे छिपाए लेती है।
12 क्या आसमान की बुलन्दी में ख़ुदा नहीं?
और तारों की बुलन्दी को देख वह कैसे ऊँचे हैं।
13 फिर तू कहता है, कि 'ख़ुदा क्या जानता है?
क्या वह गहरी तारीकी में से 'अदालत करेगा?
14 पानी से भरे हुए बादल उसके लिए पर्दा हैं कि वह देख नहीं सकता;
वह आसमान के दाइरे में सैर करता फिरता है।
15 क्या तू उसी पुरानी राह पर चलता रहेगा,
जिस पर शरीर लोग चले हैं?
16 जो अपने वक़्त से पहले उठा लिए गए,
और सैलाब उनकी बुनियाद को बहा ले गया।
17 जो ख़ुदा से कहते थे, 'हमारे पास से चला जा,
'और यह कि, 'क़ादिर — ए — मुतलक़ हमारे लिए कर क्या सकता है?'
18 तोभी उसने उनके घरों को अच्छी अच्छी चीज़ों से भर दिया —
लेकिन शरीरों की मशवरत मुझ से दूर है।
19 सादिक़ यह देख कर ख़ुश होते हैं,
और बे गुनाह उनकी हँसी उड़ाते हैं।
20 और कहते हैं, कि यक़ीनन वह जो हमारे ख़िलाफ़ उठे थे कट गए,
और जो उनमें से बाक़ी रह गए थे, उनको आग ने भस्म कर दिया है।
21 “उससे मिला रह, तो सलामत रहेगा;
और इससे तेरा भला होगा।
22 मैं तेरी मिन्नत करता हूँ,
कि शरी'अत को उसी की ज़बानी क़ुबूल कर और उसकी बातों को अपने दिल में रख ले।
23 अगर तू क़ादिर — ए — मुतलक़ की तरफ़ फिरे तो बहाल किया जाएगा।
बशर्ते कि तू नारास्ती को अपने ख़ेमों से दूर कर दे।
24 तू अपने ख़ज़ाने' को मिट्टी में,
और ओफ़ीर के सोने को नदियों के पत्थरों में डाल दे,
25 तब क़ादिर — ए — मुतलक़ तेरा ख़ज़ाना,
और तेरे लिए बेश क़ीमत चाँदी होगा।
26 क्यूँकि तब ही तू क़ादिर — ए — मुतलक़ में मसरूर रहेगा,
और ख़ुदा की तरफ़ अपना मुँह उठाएगा।
27 तू उससे दुआ करेगा, वह तेरी सुनेगा;
और तू अपनी मिन्नतें पूरी करेगा।
28 जिस बात को तू कहेगा,
वह तेरे लिए हो जाएगी और नूर तेरी राहों को रोशन करेगा।
29 जब वह पस्त करेंगे, तू कहेगा, 'बुलन्दी होगी।
और वह हलीम आदमी को बचाएगा।
30 वह उसको भी छुड़ा लेगा, जो बेगुनाह नहीं है;
हाँ वह तेरे हाथों की पाकीज़गी की वजह से छुड़ाया जाएगा।”